लैंटाना बना पहाड़ की बड़ी चुनौती, प्रधान संगठन दुगड्डा ने उठाई ठोस कार्रवाई की मांग।



कोटद्वार: पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से फैल रही लैंटाना की झाड़ियां अब पर्यावरण और ग्रामीण जीवन के लिए गंभीर संकट बनती जा रही हैं। इसी मुद्दे को लेकर आज प्रधान संगठन दुगड्डा ने खंड विकास अधिकारी के माध्यम से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपते हुए तत्काल प्रभावी कार्ययोजना बनाने की मांग उठाई।


प्रधान संगठन के अध्यक्ष सरदार सिंह नेगी ने कहा कि लैंटाना उन्मूलन को लेकर कई बार शासन-प्रशासन को अवगत कराया गया, लेकिन स्थिति दिन-ब-दिन विकराल होती जा रही है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक वनस्पति समस्या नहीं, बल्कि पलायन, आजीविका और मानव–वन्यजीव संघर्ष से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।
उन्होंने बताया कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पहले से ही रोजगार और सुविधाओं की कमी है, जिससे गांव खाली हो रहे हैं। अब लैंटाना की झाड़ियों ने बची-खुची खेती और पशुपालन को भी खत्म करने का काम किया है।
लैंटाना के बड़े नुकसान।
1. खेती पूरी तरह प्रभावित
लैंटाना तेजी से फैलकर उपजाऊ जमीन पर कब्जा कर लेता है, जिससे खेत बंजर हो जाते हैं और फसल उत्पादन लगभग खत्म हो जाता है।
2. पशुपालन पर असर
इन झाड़ियों के कारण घास के मैदान खत्म हो रहे हैं, जिससे पशुओं के लिए चारा संकट पैदा हो गया है।
3. मानव–वन्यजीव संघर्ष में बढ़ोतरी
घनी झाड़ियों में छिपकर गुलदार जैसे खतरनाक जानवर आसानी से शिकार करते हैं, जिससे ग्रामीणों पर हमले बढ़ रहे हैं।
4. पलायन को बढ़ावा
जब खेती, रोजगार और सुरक्षा तीनों खत्म हो जाएं, तो गांव छोड़ना मजबूरी बन जाता है—लैंटाना इस स्थिति को और खराब कर रहा है।
5. जैव विविधता को नुकसान
लैंटाना एक आक्रामक प्रजाति है, जो स्थानीय पौधों को खत्म कर पर्यावरण संतुलन बिगाड़ देती है।
6. आग लगने का खतरा
सूखी लैंटाना झाड़ियां जंगलों में आग को तेजी से फैलाने में मदद करती हैं।

ग्रामीणों की बढ़ती चिंता।
सरदार सिंह नेगी ने कहा कि लैंटाना की झाड़ियों में घात लगाकर बैठे गुलदार के हमलों में कई ग्रामीण अपनी जान गंवा चुके हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में भय का माहौल है।
उन्होंने साफ कहा कि अगर समय रहते लैंटाना उन्मूलन के लिए ठोस नीति नहीं बनाई गई, तो आने वाले समय में हालात और भयावह हो सकते हैं।
सरकार से मांग।
प्रधान संगठन ने सरकार से मांग की है कि:
लैंटाना उन्मूलन के लिए विशेष अभियान चलाया जाए।
ग्रामीणों को इसमें रोजगार से जोड़ा जाए।
वन विभाग, ग्राम पंचायत और प्रशासन मिलकर संयुक्त कार्ययोजना बनाए।
ग्रामीणों का कहना है कि पलायन रोकने के दावे तभी सफल होंगे, जब जमीन पर ऐसी समस्याओं का समाधान किया जाएगा।
संपादक–दलीप कश्यप:–9927389098







